"तुम ना आई"

2:36 PM Posted by संगीता मनराल

याद है
मैं अक्सर
कहता था
मरते समय
तुम मेरे
पास ही रहना
शायद उन
अन्तिम पलों के
साथ से मुझे
स्वर्ग
नसीब हो जाये

और तुम
इस बात को
हवा में तैरते
झाग के
बुलबुले सा
हंसकर
टाल देती

सांसों कि
उन हर
आखिरी कङी मे
तुम्हें पुकारते
मेरी आत्मा
त्रस्त हो गई

आज भी मैं
कई पीपल के
पेङों पर
उलटा
लटका रहता हूँ

"मेरी एक अदद छत"

4:53 PM Posted by संगीता मनराल

तुम
कितना बदल गये हो
मैं तो
बहुत खुश थी
बरसात मे टपकती
उस छत के नीचे भी

मुझे यकिन नहीं
क्या सच ??
ये सब
मेरी खुशी के लिये था
लेकिन
आज मेरे पास
सिर्फ मैं और तुम्हारी
ख्वाहिश वाली
छत ही तो है

मैं
क्या करू?
तुम दूर जाने लगे हो
उस रेल कि
पटरी कि तरह
जो मेरी खङी
जमीन से चौङी
और
दूर जाकर
एक
संकरे रस्ते में
बदल जाती है

"तुम्हारा नाम"

10:22 AM Posted by संगीता मनराल

सुनो!
मैं उन
ऊँची वादियों के
बीच तुम्हारा
नाम पुकारना
चाहती हूँ

जहाँ से
वो आवाज़
हर वादी-पहाङ
से टकराकर तुम्हें
कई बार सुनाई दे