याद है
मैं अक्सर
कहता था
मरते समय
तुम मेरे
पास ही रहना
शायद उन
अन्तिम पलों के
साथ से मुझे
स्वर्ग
नसीब हो जाये
और तुम
इस बात को
हवा में तैरते
झाग के
बुलबुले सा
हंसकर
टाल देती
सांसों कि
उन हर
आखिरी कङी मे
तुम्हें पुकारते
मेरी आत्मा
त्रस्त हो गई
आज भी मैं
कई पीपल के
पेङों पर
उलटा
लटका रहता हूँ
Friday, May 19, 2006
Wednesday, May 10, 2006
"मेरी एक अदद छत"
तुम
कितना बदल गये हो
मैं तो
बहुत खुश थी
बरसात मे टपकती
उस छत के नीचे भी
मुझे यकिन नहीं
क्या सच ??
ये सब
मेरी खुशी के लिये था
लेकिन
आज मेरे पास
सिर्फ मैं और तुम्हारी
ख्वाहिश वाली
छत ही तो है
मैं
क्या करू?
तुम दूर जाने लगे हो
उस रेल कि
पटरी कि तरह
जो मेरी खङी
जमीन से चौङी
और
दूर जाकर
एक
संकरे रस्ते में
बदल जाती है
कितना बदल गये हो
मैं तो
बहुत खुश थी
बरसात मे टपकती
उस छत के नीचे भी
मुझे यकिन नहीं
क्या सच ??
ये सब
मेरी खुशी के लिये था
लेकिन
आज मेरे पास
सिर्फ मैं और तुम्हारी
ख्वाहिश वाली
छत ही तो है
मैं
क्या करू?
तुम दूर जाने लगे हो
उस रेल कि
पटरी कि तरह
जो मेरी खङी
जमीन से चौङी
और
दूर जाकर
एक
संकरे रस्ते में
बदल जाती है
Wednesday, May 03, 2006
"तुम्हारा नाम"
सुनो!
मैं उन
ऊँची वादियों के
बीच तुम्हारा
नाम पुकारना
चाहती हूँ
जहाँ से
वो आवाज़
हर वादी-पहाङ
से टकराकर तुम्हें
कई बार सुनाई दे
मैं उन
ऊँची वादियों के
बीच तुम्हारा
नाम पुकारना
चाहती हूँ
जहाँ से
वो आवाज़
हर वादी-पहाङ
से टकराकर तुम्हें
कई बार सुनाई दे
Friday, April 28, 2006
"माँ के लिये"
(1)
माँ!
मेरे सर में
जूँऐं क्यों नहीं
काश!
होतीं तो तुम
कुछ देर
के लिये ही सही
मेरा सर
अपनी गोद मे तो लेतीं
(2)
माँ!
सब कहते हैं
मैं तुम्हारी ही
परछाई हूँ
लेकिन सच
तो ये है
मैं
तुम तक कभी
पहुँच नही पाई हूँ
माँ!
मेरे सर में
जूँऐं क्यों नहीं
काश!
होतीं तो तुम
कुछ देर
के लिये ही सही
मेरा सर
अपनी गोद मे तो लेतीं
(2)
माँ!
सब कहते हैं
मैं तुम्हारी ही
परछाई हूँ
लेकिन सच
तो ये है
मैं
तुम तक कभी
पहुँच नही पाई हूँ
Wednesday, April 19, 2006
"बस यूँ ही"
आज चौराहे से
गुजरते मैंने
शायद तुम्हें देखा था
तुम
उस पर बनी
रेड लाईट पर
अपनी पुरानी पङ चुकी
हल्के नीले रंग कि
फियेट में बैठे
मुँह में सिगार लगाये
लाईट के
ग्रीन होने का
इन्तज़ार कर रहे थे
इतने
सालों के
बाद भी तुम
बिलकुल नहीं बदले
तभी
मैं तुम्हें
झट से
पहचान गई
तुम्हारे
ललाट पर
पहले से भी ज्यादा
चमक महसूस की
कहो !
कहीं वो
उम्र के तर्जुबे का
असर तो नहीं
गुजरते मैंने
शायद तुम्हें देखा था
तुम
उस पर बनी
रेड लाईट पर
अपनी पुरानी पङ चुकी
हल्के नीले रंग कि
फियेट में बैठे
मुँह में सिगार लगाये
लाईट के
ग्रीन होने का
इन्तज़ार कर रहे थे
इतने
सालों के
बाद भी तुम
बिलकुल नहीं बदले
तभी
मैं तुम्हें
झट से
पहचान गई
तुम्हारे
ललाट पर
पहले से भी ज्यादा
चमक महसूस की
कहो !
कहीं वो
उम्र के तर्जुबे का
असर तो नहीं
Friday, March 31, 2006
"यादों कि गठरी से"
जिन्दगी की कई बातें, हमारी यादों का ऐसा हिस्सा बन जाती हैं जहाँ उस समय के अहसास खुद-बा- खुद महसूस होने लगते हैं
जिन रास्तों से मैं स्कूल के लिये गुजरा करती थी वहाँ सङक के दोनों ओर लाईन से लम्बे लम्बे शहतूत और जामुन के पेङ हुआ करते थे
बहुत मज़ा आता था हम गर्मियों में स्कूल से लौटते समय बिना हायजिनिक बने, ज़मीन पर पङे शहतूत और जामून उठाकर खा जाया करते थे जब कभी स्कूल की सफेद यूर्नीफाम पर वही फल गिरते तो बहुत गुस्सा आता और तब मुहँ से यही निकलता "क्या है, जरूरी होता है तभी गिरना जब मैं यहाँ से गुजरती हूँ, एक मिनट बाद नही गिर सकते थे"
लेकिन अब, ये सब मेरी याद की किताबों के सुनहरे पन्ने बनकर मेरे पास हैं
देखो!
ये बैंगनी दाग
अब तक मेरे
इस सफेद कुर्ते पर
जस के तस हैं
याद है ना
ये हमारे
रास्ते में
खङे
जामुन और शहतूत के
पेङो से
अचानक
गिर पङने वाले
फलों कि
शरारत
हुआ करती थी
जैसे उन्हें
गिर पङने को
तुमने कहा हो
+++++++++++++++
जिन रास्तों से मैं स्कूल के लिये गुजरा करती थी वहाँ सङक के दोनों ओर लाईन से लम्बे लम्बे शहतूत और जामुन के पेङ हुआ करते थे
बहुत मज़ा आता था हम गर्मियों में स्कूल से लौटते समय बिना हायजिनिक बने, ज़मीन पर पङे शहतूत और जामून उठाकर खा जाया करते थे जब कभी स्कूल की सफेद यूर्नीफाम पर वही फल गिरते तो बहुत गुस्सा आता और तब मुहँ से यही निकलता "क्या है, जरूरी होता है तभी गिरना जब मैं यहाँ से गुजरती हूँ, एक मिनट बाद नही गिर सकते थे"
लेकिन अब, ये सब मेरी याद की किताबों के सुनहरे पन्ने बनकर मेरे पास हैं
देखो!
ये बैंगनी दाग
अब तक मेरे
इस सफेद कुर्ते पर
जस के तस हैं
याद है ना
ये हमारे
रास्ते में
खङे
जामुन और शहतूत के
पेङो से
अचानक
गिर पङने वाले
फलों कि
शरारत
हुआ करती थी
जैसे उन्हें
गिर पङने को
तुमने कहा हो
+++++++++++++++
Wednesday, March 22, 2006
"तुम्हारा इन्तजार"
वो हाथ
जिन्हें तुम
उम्र भर थाम कर
साथ
चलना चाहते थे
आज
हवा के झोकें
के बिना भी
काँप जाते हैं
और
ये आँखे
जिनमें तुम
अपनी किस्मत के
सितारे ढूँढा करते थे
आज पनियाली
हो चुकी हैं
तुम्हारे
इन्तजार में
बिताये हुये पल
क्या..?
गिन नहीं सकते, तुम
मेरे चेहरे पर पङी
झुर्रियों की लकीरों से
जिन्हें तुम
उम्र भर थाम कर
साथ
चलना चाहते थे
आज
हवा के झोकें
के बिना भी
काँप जाते हैं
और
ये आँखे
जिनमें तुम
अपनी किस्मत के
सितारे ढूँढा करते थे
आज पनियाली
हो चुकी हैं
तुम्हारे
इन्तजार में
बिताये हुये पल
क्या..?
गिन नहीं सकते, तुम
मेरे चेहरे पर पङी
झुर्रियों की लकीरों से
Friday, March 10, 2006
"सुनहरे अध्याय"
वर्तमान की दौङ में
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये
अध्याय - ०१
-------------
याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर
जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था
माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी
याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी
और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था
अध्याय - ०२
-----------
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं
और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन
अध्याय - ०३
---------------
और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं
तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
---------------
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये
अध्याय - ०१
-------------
याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर
जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था
माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी
याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी
और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था
अध्याय - ०२
-----------
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं
और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन
अध्याय - ०३
---------------
और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं
तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
---------------
Thursday, March 09, 2006
अनकही यादें...
अनकही यादें - ०१
****************
मुझे आज भी
अपनी किताबों से भरी
अलमारी के सामने
तुम्हारा बिंम्ब
नजर
आने लगता है
जहाँ तुम अपने
पँजों के बल पर
उचककर
किताबों के ढेर में
अपनी पंसदीदा
किताब को तलाशते
घंटों बिता
देती थी
और मैं तुम्हारी
ऐङी पर पङी
गहरी, फटी
दरारों को देखता रहता
अनकही यादें - ०२
****************
गये पतझङ में
मैं तुम्हारे
आँगन मे खङे
पीपल के
पीले गिरे पत्तों से
चुनकर
एक सूखा पत्ता
उठा लाया था
वो
आज भी
मेरे पास
मेरी पसंदीदा
किताब के
पेज नम्बर २६
के बीच पङा
मुझे
परदेस में
तुम्हारा
प्यार देने को
सुरक्षित है
Wednesday, March 08, 2006
दायरे.....
वो दायरे
तुम्हीं ने तो बनाये थे
हमारे रिश्ते के बीच
और आज
तुम ही पूछते हो
क्यों तुम
इतनी पराई लगती हो...??
कल रात का सपना
मेरे सर पर लाल सुनहरे गोटे वाली चुनरी और माथे पर बङी गोल सिंदूर की लाल बिंदिया थी. उस दिन मैं खुद को एक महारानी सा महसूस कर रही थी.
सभी अपने अनुभवों कि लम्बी चादर फैलाकर शायद मुझे भी अहसास कराना चाह रहे थे कि मैं भी उन लोगो मे से एक उस पर बैठी हुई हूँ.
माँ ने नज़र का काला टीका लगाया था मेरे दाँये कान के पीछे, ठीक निचले हिस्से पर, लेकिन फिर भी हर दो मिनट बाद आकर मेरे चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी मेरे सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें मुझपर आ गिरेगीं.
आज का दिन जिन्दगी मे एक ऐसी खुशी सा लग रहा था जो मेरे अलावा वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर अपने आप झलक पङता. माँ बनने का गौरव और खुशी आज दुगनी हो गई.
सभी औरतों ने बारी बारी से मेरी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और मैं सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती.
इसी क्रम मे सारी रात कब बीती और कब सुबह हो गई पता भी नहीं चला माँ सिरहाने बैठी उठा रहीं थीं, और मेरी आँखे खोलते ही पूछने लगीं क्या हुआ सोते हुये मुस्कुरा क्यों रही थी.. कोई अच्छा सपना देखा क्या? और मैं उन्हें देखकर फिर से मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी सच सपना तो वकई बहुत अच्छा था..
सभी अपने अनुभवों कि लम्बी चादर फैलाकर शायद मुझे भी अहसास कराना चाह रहे थे कि मैं भी उन लोगो मे से एक उस पर बैठी हुई हूँ.
माँ ने नज़र का काला टीका लगाया था मेरे दाँये कान के पीछे, ठीक निचले हिस्से पर, लेकिन फिर भी हर दो मिनट बाद आकर मेरे चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी मेरे सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें मुझपर आ गिरेगीं.
आज का दिन जिन्दगी मे एक ऐसी खुशी सा लग रहा था जो मेरे अलावा वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर अपने आप झलक पङता. माँ बनने का गौरव और खुशी आज दुगनी हो गई.
सभी औरतों ने बारी बारी से मेरी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और मैं सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती.
इसी क्रम मे सारी रात कब बीती और कब सुबह हो गई पता भी नहीं चला माँ सिरहाने बैठी उठा रहीं थीं, और मेरी आँखे खोलते ही पूछने लगीं क्या हुआ सोते हुये मुस्कुरा क्यों रही थी.. कोई अच्छा सपना देखा क्या? और मैं उन्हें देखकर फिर से मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी सच सपना तो वकई बहुत अच्छा था..
Saturday, February 25, 2006
वो वक्त
वो शाम
आज तक याद है मुझे
जब तुम्हारे
प्रथम आलिंगन ने
ये अहसास कराया था
की प्रेम
शायद वासना से ऊपर
उस हिमालय पर बैठे
शिव सा स्थिर और पवित्र है
वो वक्त
थम सा गया
मेरी जिन्दगी मे
और मैं उसे
अपने जीवन का
सत्य मानकर
सांसे लेती रही
आज जब तुम्हें
देखती हूँ
किसी और के
वक्त का हिस्सा
बनते हुऐ
तब
वही वक्त जो
थम गया था
मेरे लिए
मेरी कल्पना को
सहारा देने
मुझे
मुँह् चिढाता है
आज तक याद है मुझे
जब तुम्हारे
प्रथम आलिंगन ने
ये अहसास कराया था
की प्रेम
शायद वासना से ऊपर
उस हिमालय पर बैठे
शिव सा स्थिर और पवित्र है
वो वक्त
थम सा गया
मेरी जिन्दगी मे
और मैं उसे
अपने जीवन का
सत्य मानकर
सांसे लेती रही
आज जब तुम्हें
देखती हूँ
किसी और के
वक्त का हिस्सा
बनते हुऐ
तब
वही वक्त जो
थम गया था
मेरे लिए
मेरी कल्पना को
सहारा देने
मुझे
मुँह् चिढाता है
Friday, February 17, 2006
अनजानी पहचान
मैं रोज़ की तरह
आज भी
उसी १२ न० की बस से
आफिस जाता हूँ
वो बस
बीच रस्ते में
मुझे उतार देती थी
लेकिन फिर भी
तेरी एक झलक के लिये
ये कम था
मैं कन्डक्ट की सीट
की दाँई तरफ से
चौथी सीट पर बैठा
तुम्हारे स्टाप आने का
इन्तज़ार करता
और तुम
चुपचाप चढकर
बाँई ओर
से तीसरी सीट पर बैठ जाती
मैं मंत्रमुग्ध सा
तुम्हें निहारता रहता
और कई बार सोचता
कि काश
ये रस्ता
तुम्हारा स्टाप आने तक
बहुत लम्बा हो जाये
फिर तुम
मुझसे पहले ही
उतर जाती
उस दिन तुम्हें
अपनी
बगल वाली सीट पर
ना देखकर लगा
तुम
मुझसे
बहुत दूर चली गई हो...
आज भी
उसी १२ न० की बस से
आफिस जाता हूँ
वो बस
बीच रस्ते में
मुझे उतार देती थी
लेकिन फिर भी
तेरी एक झलक के लिये
ये कम था
मैं कन्डक्ट की सीट
की दाँई तरफ से
चौथी सीट पर बैठा
तुम्हारे स्टाप आने का
इन्तज़ार करता
और तुम
चुपचाप चढकर
बाँई ओर
से तीसरी सीट पर बैठ जाती
मैं मंत्रमुग्ध सा
तुम्हें निहारता रहता
और कई बार सोचता
कि काश
ये रस्ता
तुम्हारा स्टाप आने तक
बहुत लम्बा हो जाये
फिर तुम
मुझसे पहले ही
उतर जाती
उस दिन तुम्हें
अपनी
बगल वाली सीट पर
ना देखकर लगा
तुम
मुझसे
बहुत दूर चली गई हो...
Thursday, February 16, 2006
मेरे लम्बी कवीता ०१
तुम
बहुत अच्छे हो
बोलती हूँ कई बार
लेकिन
तुम यकीन नहीं करते
हमेशा की तरह
और
अपनी गर्दन झटक कर
मुहँ से बस
ऊहँ कह देते हो
मैं
यकीन दिलाने को
पूरे विश्वास से
तुम्हें देखकर
फिर बोलती हूँ
तुम....
बहुत अच्छे हो
तुम
फिर ना मानकर
दोबारा पूछने लगते हो
अच्छा हूँ....??
तो बताओ कैसे......???
मै
कुछ पल सोचकर
मुस्कुरा देती हूँ
और
प्यार से तुम्हारे
माथे को चूमकर
फिर बोलती हूँ
हाँ बस,
अच्छे हो.....
लेकिन तुम
ना मानने कि ठानकर
एक ज़िद्दी बच्चे से
इस बात पर अडकर
हट करते हुये,
झुझंलाकर
फिर बोलते हो
लेकिन बताओ तो कैसे,
कैसे मैं अच्छा हूँ......???
मैं असमंजस मे
उस स्थति मे आ पहुँचती हूँ
जहाँ मेरा मन
तुम्हें प्यार और अपना
सब कुछ
देने को व्याकुल
हो उठता है
मन
जो बहुत कुछ
कहना चाहता है लेकिन
दिमाग
उन सब शब्दों को
खोजता रह जाता है
जिनसे तुम्हें
यकिन हो जाये
कि सच
तुम बहुत अच्छे हो..
फिर तभी
तुम्हें यकीन
दिलाने को
मैं कह उठती हूँ
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मेरी सांसों में
तुम्हारी ही खुशबू आती है
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मेरे दिल से तुम्हारा नाम
इन रगो के कतरे कतरे मे
जा बसा है
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मैं खुद मे तुमको
ढूढनें लगती हूँ
शायद
ये सब सुनकर
तुम्हें यकीन हो जाये
की सच
तुम बहुत अच्छे हो
इस दुनिया में
मौजूद सभी चीज़ों से...
----------------------
बहुत अच्छे हो
बोलती हूँ कई बार
लेकिन
तुम यकीन नहीं करते
हमेशा की तरह
और
अपनी गर्दन झटक कर
मुहँ से बस
ऊहँ कह देते हो
मैं
यकीन दिलाने को
पूरे विश्वास से
तुम्हें देखकर
फिर बोलती हूँ
तुम....
बहुत अच्छे हो
तुम
फिर ना मानकर
दोबारा पूछने लगते हो
अच्छा हूँ....??
तो बताओ कैसे......???
मै
कुछ पल सोचकर
मुस्कुरा देती हूँ
और
प्यार से तुम्हारे
माथे को चूमकर
फिर बोलती हूँ
हाँ बस,
अच्छे हो.....
लेकिन तुम
ना मानने कि ठानकर
एक ज़िद्दी बच्चे से
इस बात पर अडकर
हट करते हुये,
झुझंलाकर
फिर बोलते हो
लेकिन बताओ तो कैसे,
कैसे मैं अच्छा हूँ......???
मैं असमंजस मे
उस स्थति मे आ पहुँचती हूँ
जहाँ मेरा मन
तुम्हें प्यार और अपना
सब कुछ
देने को व्याकुल
हो उठता है
मन
जो बहुत कुछ
कहना चाहता है लेकिन
दिमाग
उन सब शब्दों को
खोजता रह जाता है
जिनसे तुम्हें
यकिन हो जाये
कि सच
तुम बहुत अच्छे हो..
फिर तभी
तुम्हें यकीन
दिलाने को
मैं कह उठती हूँ
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मेरी सांसों में
तुम्हारी ही खुशबू आती है
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मेरे दिल से तुम्हारा नाम
इन रगो के कतरे कतरे मे
जा बसा है
तुम,
तुम इतने अच्छे हो की
मैं खुद मे तुमको
ढूढनें लगती हूँ
शायद
ये सब सुनकर
तुम्हें यकीन हो जाये
की सच
तुम बहुत अच्छे हो
इस दुनिया में
मौजूद सभी चीज़ों से...
----------------------
Monday, February 13, 2006
खिडकियाँ...
मैं अनजान था
शायद
मेरी दुनियाँ के घरों कि
खिङकियों पर हमेशा
एक झीना, रुपहेला
परदा टंगा रहता था
उसकी
दूसरी तरफ
तुम्हारी छवि
कुछ धुंधली
नजर आने पर भी
मुझे पहचान में
आती रही
तुम अक्सर
किसी अप्सरा की तरह
अचानक से आकर
फिर
बोझिल हो जाती
और तब मैं उसे
अपनी नींद में
आने वाले किसी
सुखद सपने की तरह
भूलकर
फिर काम मे लग जाता
मुझे याद है
शायद मैं गलत नहीं
ये सिलसिला
तब तक चला
जब तक उन
खिडकियों पर
वो झीने रुपहले पर्दे थे
शायद
मेरी दुनियाँ के घरों कि
खिङकियों पर हमेशा
एक झीना, रुपहेला
परदा टंगा रहता था
उसकी
दूसरी तरफ
तुम्हारी छवि
कुछ धुंधली
नजर आने पर भी
मुझे पहचान में
आती रही
तुम अक्सर
किसी अप्सरा की तरह
अचानक से आकर
फिर
बोझिल हो जाती
और तब मैं उसे
अपनी नींद में
आने वाले किसी
सुखद सपने की तरह
भूलकर
फिर काम मे लग जाता
मुझे याद है
शायद मैं गलत नहीं
ये सिलसिला
तब तक चला
जब तक उन
खिडकियों पर
वो झीने रुपहले पर्दे थे
Thursday, February 09, 2006
बेचारगी
रोज़ गुजरते उस सडक पर
नजरे अक्सर टकरा जाती हैं
उस बेचारगी भरी नज़र से
और तभी
ख्याल आता है
कल ही तो दिया था तुम्हें
५ रुपये का नोट
क्या खर्च भी कर डाला
नजरे अक्सर टकरा जाती हैं
उस बेचारगी भरी नज़र से
और तभी
ख्याल आता है
कल ही तो दिया था तुम्हें
५ रुपये का नोट
क्या खर्च भी कर डाला
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