(१)
तुम्हारा आना यूँ
बेधङक मेरी जिन्दगी मे
कोई इत्तेफाक तो नहीं
तुम कैसे आये
अहसास तक ना हुआ
आज मैं खुद से ज्यादा
तुम्हें चाहती हूँ
ये कोई जादू या
कहीं कोई
साजिश तो नहीं
मुझे,
मुझसे दूर करने की
बताओ????
(२)
बांये हाथ की
रेखाओं को जोङकर
दांये हाथ से देखा
तो पाया
कि किस्मत
बहुत रंगीन रंग
दिखाने वाली है
हाँ तुम्हारे
हिस्से कि रेखाओं को
जोङकर ही तो
हथेली का आधा
चाँद उगा था
Tuesday, November 28, 2006
Wednesday, October 25, 2006
मेरी दिवाली
तुम्हारे संग मनाई
हर वो दिवाली
कुछ याद सी
आ रही है
उस रात के
अमावसी
अधेरें से दूर,
सिर्फ
मैं और तुम
दीपों के बने
गोल धारे में बैठे
इंतज़ार करते रहे
कि काश
ये अमावस,
प्रकाशवर्ष से भी
लम्बी हो जाये
हाँ सच,
उस रात
अहसास
हुआ था मुझे,
सीता मैय्या कि
अतह: पीङा का
-------------------
हर वो दिवाली
कुछ याद सी
आ रही है
उस रात के
अमावसी
अधेरें से दूर,
सिर्फ
मैं और तुम
दीपों के बने
गोल धारे में बैठे
इंतज़ार करते रहे
कि काश
ये अमावस,
प्रकाशवर्ष से भी
लम्बी हो जाये
हाँ सच,
उस रात
अहसास
हुआ था मुझे,
सीता मैय्या कि
अतह: पीङा का
-------------------
Thursday, September 14, 2006
सपनें
(१)
जिन चिटीयों को
पैरों तले
दबा दिया था
मैंने
कभी अनजाने में
वो अक्सर
मुझे मेरे
सपनों मे आकर
काटतीं हैं
उनके डंक
पूरे शरीर मे
सुई से चुभकर
सुबह तक
देह के हर
हिस्से को
सूजन मे
तबदील कर देते हैं
ऐसा अक्सर
होने लगा है आजकल
पता नहीं क्यों....?
जिन चिटीयों को
पैरों तले
दबा दिया था
मैंने
कभी अनजाने में
वो अक्सर
मुझे मेरे
सपनों मे आकर
काटतीं हैं
उनके डंक
पूरे शरीर मे
सुई से चुभकर
सुबह तक
देह के हर
हिस्से को
सूजन मे
तबदील कर देते हैं
ऐसा अक्सर
होने लगा है आजकल
पता नहीं क्यों....?
Thursday, August 31, 2006
बेचैनी
पिछले दिनों अपने ब्लाग से दूर रही कोई अलगाव, नहीं नहीं ना तो अपने से और ना ही अपने ब्लाग से बस कुछ परिस्थितियों ने आकर यूँ घेरा कि मेरे विचार उन्हीं के इर्द गिर्द सिमट कर रह गये कई बार मन हुआ कि कुछ लिखा जाये, लेकिन तभी विचार सिगरेट के धूयें से आकर सिर्फ अपनी गन्ध छोङ जाते
मुझे लेखन से बहुत प्यार है, कई बार विचार शांत खरगोश से मेरे मन के गलीचे मे छलांग मारते है, और तब में उसकी सुदंरता का बखान अपने लेखन मे कर देती हूँ
अब इंतजार कर रही हूँ कि कब वो खरगोश दिखाई दे, तब तक तलाश जारी रहेगी
मुझे लेखन से बहुत प्यार है, कई बार विचार शांत खरगोश से मेरे मन के गलीचे मे छलांग मारते है, और तब में उसकी सुदंरता का बखान अपने लेखन मे कर देती हूँ
अब इंतजार कर रही हूँ कि कब वो खरगोश दिखाई दे, तब तक तलाश जारी रहेगी
Saturday, July 22, 2006
"बेचारा बिजुका"
खेत पर खङा
बिजुका
अपने दोंनों हाथ
फैलाये
अक्सर ये
सोचता होगा
कि क्या
किसान उसे
कभी
धन्यवाद कहेगा
बिजुका
अपने दोंनों हाथ
फैलाये
अक्सर ये
सोचता होगा
कि क्या
किसान उसे
कभी
धन्यवाद कहेगा
Tuesday, July 18, 2006
"हवाओं के साथ - हम भी"
जब हवाओं का रुख कुछ ऐसा ही है, तो हमने सोचा जरा हम भी उन में थोङा बह लेते हैं, फिर बाद में बिना बयार उङने का क्या फायदा जब कोई उङता ही ना देखे...तो जनाब, पिछले दिनों हम भी उत्तरांचल भ्रमण पर गये थे वैसे मूल रूप से हम उत्तरांचल के ही है, लेकिन फिर भी वहाँ जाना बहुत कम हो पाता है, या फिर यूँ कह लिजिये कि हमेशा टूरिस्ट बनकर ही जाते हैं.
उत्तरांचल - विशाल पर्वतो से ढका हुआ, चारों तरफ हरियाली और बहुत से कतारबद्ध चीङ के लम्बें-लम्बें पेङ बहुत नीचे (अगर आप ऊँची पहाङी पर है) "रामगंगा" नदी, कलकल बहती हुयी झोपड़ीनुमा घर जिनकी छतें बङे-बङे पत्थरों से ढकी होतीं हैं जगह जगह पहाङियों से गिरते झरनें आमों से लदे हुये पेङ (हम लोग गर्मियों मे जो गये थे भई) बहुत संकरी (सर्पीली कदकाठी सी) सङकें, जिन पर एक समय में सिर्फ एक ही वाहन गुज़र सकता है यहाँ मैं जरूर कहना चाँहूगी कि वहाँ के वाहन चालकों मे बहुत धर्यता होती है तो ऐसा कुछ नज़ारा होता है उत्तरांचल का आपकी सहायता के लिये कुछ छायाचित्र भी दे रही हूँ नीचे (मेरे खुद के लिये हुये :-))
बिंसर महादेव - जैसा नाम से ही आभास होता है बिंसर महादेव, भगवान महादेव जी का मंदिर है कहा जाता है कि इस जगह कि खोज के पीछे एक कहानी है, ये जगह गाँवों से काफी दूर और जंगलों के बीच है काफी समय पहले उस जगह कब्रिस्तान हुआ करता था तब वहाँ से कोई नहीं गुजरता था (शायद भूत पिचाश के डर से) फिर बहुत समय पहले एक बाबा वहाँ आकर रहने लगे जिनका लोगों ने बहुत विरोध किया लेकिन हालात पहले से बेहतर दिखाई देने पर, लोगों ने बाबा के साथ मिलकर वहाँ मंदिर कि स्थापना की कई सालों के बाद उन बाबा ने वहीं समाधि ले ली आज भी उन बाबा को उस जगह पूजा जाता है
दूनागिरी - कहा जाता है कि जब हनुमान जी, लक्षमण जी के लिये संजीवनी बूटी ले जा रहे थे तब एक पहाङ का छोटा टुकङा वहाँ गिर गया था उसी जगह मंदिर कि स्थापना कि गई और वहाँ राम जी, लक्षमण जी, सीता मैय्या और हनुमान जी को पूजा जाता है
मानिला - मंदिर माता का मंदिर है ये मंदिर दो जगह स्थित है एक पहाङी के ऊपर जिसे "मल्ल मानिला" कहा जाता है और दूसरा "तल्ल मानिला" जो पहाङी के नीचे है मानिला मंदिर के दो जगह होने के पीछे कि कहानी कुछ ऐसी है, कि कई सालों पहले नीचे वाले मंदिर में कुछ चोर आये जो माता कि (सोने) मूर्ति चुराकर ले जाना चाहते थे लेकिन मूर्ति भारी होने के कारण वो सिर्फ माता का हाथ ही काट कर ले जा पाये, पर वो जितना ऊपर बढते गये हाथ भारी होता गया वे चोर जब थक गये तब उन्होंने हाथ (सोने का) नीचे रखा और जब उठाने लगे तब उनसे उठा नहीं तब तक कुछ गाँव वाले वहाँ आ चुके थे तभी से वो हाथ ऊपर स्थित मंदिर मे रखा गया है और वहाँ भी मंदिर कि स्थापना कि गई
एक और खास बात है इस मंदिर की, मंदिर के परिसर मे एक विशाल पेङ है जो हमेशा हर मौसम मे हरा रहता है उसमे कोई फल नहीं लगते अभी तक ये एक रहस्य है कि वो पेङ किस चीज़ का है, जो आज तक कई रिर्सचों के बाद भी रहस्य बना हुआ है
गर्जिया - माता का मंदिर है जो कोसी नदी के बीचोंबीच स्थित है बरसातों मे नदी मे बाढ आने पर भी ये मंदिर जस का तस बना रहता है यही इस मंदिर की मान्यता है
उत्तरांचल के लोगों मे भगवान के प्रति अपार श्रधा होती है वहाँ हर पहाङ पर छोटे-छोटे मंदिर होते हैं और लोग उन्हें "भूमिया" देवता के नाम से पुकारते है मतलब वहाँ भूमि को पूजा जाता है शायद यही कारण है कि वहाँ के पहाङ बहुत शांत होते हैं वहाँ घूमने के लिये बहुत से मंदिर हैं
उत्तरांचल बहुत बङा है. इसलिये कन्फ्यूज़न को दूर करते हुये बता ही देती हूँ कि, मैं कुँमाऊ की बात कर रही हूँ
तो कुछ ऐसा था हमारा भ्रमण, अध्यातम, शांति और प्रेरणा से ओतप्रोत.
Friday, June 16, 2006
Wednesday, June 07, 2006
Friday, May 19, 2006
"तुम ना आई"
याद है
मैं अक्सर
कहता था
मरते समय
तुम मेरे
पास ही रहना
शायद उन
अन्तिम पलों के
साथ से मुझे
स्वर्ग
नसीब हो जाये
और तुम
इस बात को
हवा में तैरते
झाग के
बुलबुले सा
हंसकर
टाल देती
सांसों कि
उन हर
आखिरी कङी मे
तुम्हें पुकारते
मेरी आत्मा
त्रस्त हो गई
आज भी मैं
कई पीपल के
पेङों पर
उलटा
लटका रहता हूँ
मैं अक्सर
कहता था
मरते समय
तुम मेरे
पास ही रहना
शायद उन
अन्तिम पलों के
साथ से मुझे
स्वर्ग
नसीब हो जाये
और तुम
इस बात को
हवा में तैरते
झाग के
बुलबुले सा
हंसकर
टाल देती
सांसों कि
उन हर
आखिरी कङी मे
तुम्हें पुकारते
मेरी आत्मा
त्रस्त हो गई
आज भी मैं
कई पीपल के
पेङों पर
उलटा
लटका रहता हूँ
Wednesday, May 10, 2006
"मेरी एक अदद छत"
तुम
कितना बदल गये हो
मैं तो
बहुत खुश थी
बरसात मे टपकती
उस छत के नीचे भी
मुझे यकिन नहीं
क्या सच ??
ये सब
मेरी खुशी के लिये था
लेकिन
आज मेरे पास
सिर्फ मैं और तुम्हारी
ख्वाहिश वाली
छत ही तो है
मैं
क्या करू?
तुम दूर जाने लगे हो
उस रेल कि
पटरी कि तरह
जो मेरी खङी
जमीन से चौङी
और
दूर जाकर
एक
संकरे रस्ते में
बदल जाती है
कितना बदल गये हो
मैं तो
बहुत खुश थी
बरसात मे टपकती
उस छत के नीचे भी
मुझे यकिन नहीं
क्या सच ??
ये सब
मेरी खुशी के लिये था
लेकिन
आज मेरे पास
सिर्फ मैं और तुम्हारी
ख्वाहिश वाली
छत ही तो है
मैं
क्या करू?
तुम दूर जाने लगे हो
उस रेल कि
पटरी कि तरह
जो मेरी खङी
जमीन से चौङी
और
दूर जाकर
एक
संकरे रस्ते में
बदल जाती है
Wednesday, May 03, 2006
"तुम्हारा नाम"
सुनो!
मैं उन
ऊँची वादियों के
बीच तुम्हारा
नाम पुकारना
चाहती हूँ
जहाँ से
वो आवाज़
हर वादी-पहाङ
से टकराकर तुम्हें
कई बार सुनाई दे
मैं उन
ऊँची वादियों के
बीच तुम्हारा
नाम पुकारना
चाहती हूँ
जहाँ से
वो आवाज़
हर वादी-पहाङ
से टकराकर तुम्हें
कई बार सुनाई दे
Friday, April 28, 2006
"माँ के लिये"
(1)
माँ!
मेरे सर में
जूँऐं क्यों नहीं
काश!
होतीं तो तुम
कुछ देर
के लिये ही सही
मेरा सर
अपनी गोद मे तो लेतीं
(2)
माँ!
सब कहते हैं
मैं तुम्हारी ही
परछाई हूँ
लेकिन सच
तो ये है
मैं
तुम तक कभी
पहुँच नही पाई हूँ
माँ!
मेरे सर में
जूँऐं क्यों नहीं
काश!
होतीं तो तुम
कुछ देर
के लिये ही सही
मेरा सर
अपनी गोद मे तो लेतीं
(2)
माँ!
सब कहते हैं
मैं तुम्हारी ही
परछाई हूँ
लेकिन सच
तो ये है
मैं
तुम तक कभी
पहुँच नही पाई हूँ
Wednesday, April 19, 2006
"बस यूँ ही"
आज चौराहे से
गुजरते मैंने
शायद तुम्हें देखा था
तुम
उस पर बनी
रेड लाईट पर
अपनी पुरानी पङ चुकी
हल्के नीले रंग कि
फियेट में बैठे
मुँह में सिगार लगाये
लाईट के
ग्रीन होने का
इन्तज़ार कर रहे थे
इतने
सालों के
बाद भी तुम
बिलकुल नहीं बदले
तभी
मैं तुम्हें
झट से
पहचान गई
तुम्हारे
ललाट पर
पहले से भी ज्यादा
चमक महसूस की
कहो !
कहीं वो
उम्र के तर्जुबे का
असर तो नहीं
गुजरते मैंने
शायद तुम्हें देखा था
तुम
उस पर बनी
रेड लाईट पर
अपनी पुरानी पङ चुकी
हल्के नीले रंग कि
फियेट में बैठे
मुँह में सिगार लगाये
लाईट के
ग्रीन होने का
इन्तज़ार कर रहे थे
इतने
सालों के
बाद भी तुम
बिलकुल नहीं बदले
तभी
मैं तुम्हें
झट से
पहचान गई
तुम्हारे
ललाट पर
पहले से भी ज्यादा
चमक महसूस की
कहो !
कहीं वो
उम्र के तर्जुबे का
असर तो नहीं
Friday, March 31, 2006
"यादों कि गठरी से"
जिन्दगी की कई बातें, हमारी यादों का ऐसा हिस्सा बन जाती हैं जहाँ उस समय के अहसास खुद-बा- खुद महसूस होने लगते हैं
जिन रास्तों से मैं स्कूल के लिये गुजरा करती थी वहाँ सङक के दोनों ओर लाईन से लम्बे लम्बे शहतूत और जामुन के पेङ हुआ करते थे
बहुत मज़ा आता था हम गर्मियों में स्कूल से लौटते समय बिना हायजिनिक बने, ज़मीन पर पङे शहतूत और जामून उठाकर खा जाया करते थे जब कभी स्कूल की सफेद यूर्नीफाम पर वही फल गिरते तो बहुत गुस्सा आता और तब मुहँ से यही निकलता "क्या है, जरूरी होता है तभी गिरना जब मैं यहाँ से गुजरती हूँ, एक मिनट बाद नही गिर सकते थे"
लेकिन अब, ये सब मेरी याद की किताबों के सुनहरे पन्ने बनकर मेरे पास हैं
देखो!
ये बैंगनी दाग
अब तक मेरे
इस सफेद कुर्ते पर
जस के तस हैं
याद है ना
ये हमारे
रास्ते में
खङे
जामुन और शहतूत के
पेङो से
अचानक
गिर पङने वाले
फलों कि
शरारत
हुआ करती थी
जैसे उन्हें
गिर पङने को
तुमने कहा हो
+++++++++++++++
जिन रास्तों से मैं स्कूल के लिये गुजरा करती थी वहाँ सङक के दोनों ओर लाईन से लम्बे लम्बे शहतूत और जामुन के पेङ हुआ करते थे
बहुत मज़ा आता था हम गर्मियों में स्कूल से लौटते समय बिना हायजिनिक बने, ज़मीन पर पङे शहतूत और जामून उठाकर खा जाया करते थे जब कभी स्कूल की सफेद यूर्नीफाम पर वही फल गिरते तो बहुत गुस्सा आता और तब मुहँ से यही निकलता "क्या है, जरूरी होता है तभी गिरना जब मैं यहाँ से गुजरती हूँ, एक मिनट बाद नही गिर सकते थे"
लेकिन अब, ये सब मेरी याद की किताबों के सुनहरे पन्ने बनकर मेरे पास हैं
देखो!
ये बैंगनी दाग
अब तक मेरे
इस सफेद कुर्ते पर
जस के तस हैं
याद है ना
ये हमारे
रास्ते में
खङे
जामुन और शहतूत के
पेङो से
अचानक
गिर पङने वाले
फलों कि
शरारत
हुआ करती थी
जैसे उन्हें
गिर पङने को
तुमने कहा हो
+++++++++++++++
Wednesday, March 22, 2006
"तुम्हारा इन्तजार"
वो हाथ
जिन्हें तुम
उम्र भर थाम कर
साथ
चलना चाहते थे
आज
हवा के झोकें
के बिना भी
काँप जाते हैं
और
ये आँखे
जिनमें तुम
अपनी किस्मत के
सितारे ढूँढा करते थे
आज पनियाली
हो चुकी हैं
तुम्हारे
इन्तजार में
बिताये हुये पल
क्या..?
गिन नहीं सकते, तुम
मेरे चेहरे पर पङी
झुर्रियों की लकीरों से
जिन्हें तुम
उम्र भर थाम कर
साथ
चलना चाहते थे
आज
हवा के झोकें
के बिना भी
काँप जाते हैं
और
ये आँखे
जिनमें तुम
अपनी किस्मत के
सितारे ढूँढा करते थे
आज पनियाली
हो चुकी हैं
तुम्हारे
इन्तजार में
बिताये हुये पल
क्या..?
गिन नहीं सकते, तुम
मेरे चेहरे पर पङी
झुर्रियों की लकीरों से
Friday, March 10, 2006
"सुनहरे अध्याय"
वर्तमान की दौङ में
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये
अध्याय - ०१
-------------
याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर
जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था
माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी
याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी
और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था
अध्याय - ०२
-----------
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं
और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन
अध्याय - ०३
---------------
और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं
तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
---------------
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये
अध्याय - ०१
-------------
याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर
जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था
माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी
याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी
और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था
अध्याय - ०२
-----------
माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं
और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन
अध्याय - ०३
---------------
और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं
तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
---------------
Thursday, March 09, 2006
अनकही यादें...
अनकही यादें - ०१
****************
मुझे आज भी
अपनी किताबों से भरी
अलमारी के सामने
तुम्हारा बिंम्ब
नजर
आने लगता है
जहाँ तुम अपने
पँजों के बल पर
उचककर
किताबों के ढेर में
अपनी पंसदीदा
किताब को तलाशते
घंटों बिता
देती थी
और मैं तुम्हारी
ऐङी पर पङी
गहरी, फटी
दरारों को देखता रहता
अनकही यादें - ०२
****************
गये पतझङ में
मैं तुम्हारे
आँगन मे खङे
पीपल के
पीले गिरे पत्तों से
चुनकर
एक सूखा पत्ता
उठा लाया था
वो
आज भी
मेरे पास
मेरी पसंदीदा
किताब के
पेज नम्बर २६
के बीच पङा
मुझे
परदेस में
तुम्हारा
प्यार देने को
सुरक्षित है
Wednesday, March 08, 2006
दायरे.....
वो दायरे
तुम्हीं ने तो बनाये थे
हमारे रिश्ते के बीच
और आज
तुम ही पूछते हो
क्यों तुम
इतनी पराई लगती हो...??
कल रात का सपना
मेरे सर पर लाल सुनहरे गोटे वाली चुनरी और माथे पर बङी गोल सिंदूर की लाल बिंदिया थी. उस दिन मैं खुद को एक महारानी सा महसूस कर रही थी.
सभी अपने अनुभवों कि लम्बी चादर फैलाकर शायद मुझे भी अहसास कराना चाह रहे थे कि मैं भी उन लोगो मे से एक उस पर बैठी हुई हूँ.
माँ ने नज़र का काला टीका लगाया था मेरे दाँये कान के पीछे, ठीक निचले हिस्से पर, लेकिन फिर भी हर दो मिनट बाद आकर मेरे चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी मेरे सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें मुझपर आ गिरेगीं.
आज का दिन जिन्दगी मे एक ऐसी खुशी सा लग रहा था जो मेरे अलावा वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर अपने आप झलक पङता. माँ बनने का गौरव और खुशी आज दुगनी हो गई.
सभी औरतों ने बारी बारी से मेरी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और मैं सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती.
इसी क्रम मे सारी रात कब बीती और कब सुबह हो गई पता भी नहीं चला माँ सिरहाने बैठी उठा रहीं थीं, और मेरी आँखे खोलते ही पूछने लगीं क्या हुआ सोते हुये मुस्कुरा क्यों रही थी.. कोई अच्छा सपना देखा क्या? और मैं उन्हें देखकर फिर से मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी सच सपना तो वकई बहुत अच्छा था..
सभी अपने अनुभवों कि लम्बी चादर फैलाकर शायद मुझे भी अहसास कराना चाह रहे थे कि मैं भी उन लोगो मे से एक उस पर बैठी हुई हूँ.
माँ ने नज़र का काला टीका लगाया था मेरे दाँये कान के पीछे, ठीक निचले हिस्से पर, लेकिन फिर भी हर दो मिनट बाद आकर मेरे चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी मेरे सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें मुझपर आ गिरेगीं.
आज का दिन जिन्दगी मे एक ऐसी खुशी सा लग रहा था जो मेरे अलावा वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर अपने आप झलक पङता. माँ बनने का गौरव और खुशी आज दुगनी हो गई.
सभी औरतों ने बारी बारी से मेरी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और मैं सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती.
इसी क्रम मे सारी रात कब बीती और कब सुबह हो गई पता भी नहीं चला माँ सिरहाने बैठी उठा रहीं थीं, और मेरी आँखे खोलते ही पूछने लगीं क्या हुआ सोते हुये मुस्कुरा क्यों रही थी.. कोई अच्छा सपना देखा क्या? और मैं उन्हें देखकर फिर से मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी सच सपना तो वकई बहुत अच्छा था..
Saturday, February 25, 2006
वो वक्त
वो शाम
आज तक याद है मुझे
जब तुम्हारे
प्रथम आलिंगन ने
ये अहसास कराया था
की प्रेम
शायद वासना से ऊपर
उस हिमालय पर बैठे
शिव सा स्थिर और पवित्र है
वो वक्त
थम सा गया
मेरी जिन्दगी मे
और मैं उसे
अपने जीवन का
सत्य मानकर
सांसे लेती रही
आज जब तुम्हें
देखती हूँ
किसी और के
वक्त का हिस्सा
बनते हुऐ
तब
वही वक्त जो
थम गया था
मेरे लिए
मेरी कल्पना को
सहारा देने
मुझे
मुँह् चिढाता है
आज तक याद है मुझे
जब तुम्हारे
प्रथम आलिंगन ने
ये अहसास कराया था
की प्रेम
शायद वासना से ऊपर
उस हिमालय पर बैठे
शिव सा स्थिर और पवित्र है
वो वक्त
थम सा गया
मेरी जिन्दगी मे
और मैं उसे
अपने जीवन का
सत्य मानकर
सांसे लेती रही
आज जब तुम्हें
देखती हूँ
किसी और के
वक्त का हिस्सा
बनते हुऐ
तब
वही वक्त जो
थम गया था
मेरे लिए
मेरी कल्पना को
सहारा देने
मुझे
मुँह् चिढाता है
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