"माँ के लिये"

4:53 PM Posted by संगीता मनराल

(1)

माँ!
मेरे सर में
जूँऐं क्यों नहीं

काश!
होतीं तो तुम
कुछ देर
के लिये ही सही
मेरा सर
अपनी गोद मे तो लेतीं


(2)

माँ!
सब कहते हैं
मैं तुम्हारी ही
परछाई हूँ
लेकिन सच
तो ये है
मैं
तुम तक कभी
पहुँच नही पाई हूँ

"बस यूँ ही"

5:16 PM Posted by संगीता मनराल

आज चौराहे से
गुजरते मैंने
शायद तुम्हें देखा था

तुम
उस पर बनी
रेड लाईट पर
अपनी पुरानी पङ चुकी
हल्के नीले रंग कि
फियेट में बैठे
मुँह में सिगार लगाये
लाईट के
ग्रीन होने का
इन्तज़ार कर रहे थे

इतने
सालों के
बाद भी तुम
बिलकुल नहीं बदले
तभी
मैं तुम्हें
झट से
पहचान गई

तुम्हारे
ललाट पर
पहले से भी ज्यादा
चमक महसूस की
कहो !
कहीं वो
उम्र के तर्जुबे का
असर तो नहीं