"यादों कि गठरी से"

4:32 PM Posted by संगीता मनराल

जिन्दगी की कई बातें, हमारी यादों का ऐसा हिस्सा बन जाती हैं जहाँ उस समय के अहसास खुद-बा- खुद महसूस होने लगते हैं

जिन रास्तों से मैं स्कूल के लिये गुजरा करती थी वहाँ सङक के दोनों ओर लाईन से लम्बे लम्बे शहतूत और जामुन के पेङ हुआ करते थे

बहुत मज़ा आता था हम गर्मियों में स्कूल से लौटते समय बिना हायजिनिक बने, ज़मीन पर पङे शहतूत और जामून उठाकर खा जाया करते थे जब कभी स्कूल की सफेद यूर्नीफाम पर वही फल गिरते तो बहुत गुस्सा आता और तब मुहँ से यही निकलता "क्या है, जरूरी होता है तभी गिरना जब मैं यहाँ से गुजरती हूँ, एक मिनट बाद नही गिर सकते थे"

लेकिन अब, ये सब मेरी याद की किताबों के सुनहरे पन्ने बनकर मेरे पास हैं

देखो!
ये बैंगनी दाग
अब तक मेरे
इस सफेद कुर्ते पर
जस के तस हैं

याद है ना
ये हमारे
रास्ते में
खङे
जामुन और शहतूत के
पेङो से
अचानक
गिर पङने वाले
फलों कि
शरारत
हुआ करती थी

जैसे उन्हें
गिर पङने को
तुमने कहा हो

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"तुम्हारा इन्तजार"

9:59 AM Posted by संगीता मनराल

वो हाथ
जिन्हें तुम
उम्र भर थाम कर
साथ
चलना चाहते थे
आज
हवा के झोकें
के बिना भी
काँप जाते हैं

और
ये आँखे
जिनमें तुम
अपनी किस्मत के
सितारे ढूँढा करते थे
आज पनियाली
हो चुकी हैं

तुम्हारे
इन्तजार में
बिताये हुये पल
क्या..?
गिन नहीं सकते, तुम
मेरे चेहरे पर पङी
झुर्रियों की लकीरों से

"सुनहरे अध्याय"

5:10 PM Posted by संगीता मनराल

वर्तमान की दौङ में
अतीत के कई
सुनहरे अध्याय
कोसों लम्बी दूरीयों में
तबदील होकर
पीछे छूट गये

अध्याय - ०१
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याद
आ रहा है आज
वो बरगद का पेङ
और
उसकी छाँव में
कच्ची मिट्टी से बना
छोटा मंदिर

जो हमेशा
बरसात में
काई से जडा
कोनों से
हरा हो जाता था

माँ-पपा की डाँट
की शिकायत करने
मै अक्सर
वहीं जाती थी

याद है मुझे
माँ उन महीनों में
आने वाले हर व्रत
के दिन
भगवान के साथ
उस बरगद को भी
पूजती थी

और
उस बरगद का तना
लाल पीले धागों से लिपटा
बहुत सुन्दर लगता था


अध्याय - ०२
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माँ
तुमने ही बताया था, शायद
वो पपा की साईकिल
और
तुम्हारी अंगीठी
बेच दी कल
कबाङी वाले को
कबाङ के दाम
ये वही साईकिल थी ना
जिसपर बैठकर
पपा रोज़
आफिस जाया
करते थे
और तुम
उन्हें पुराने
अखबार के टुकङे में
रोटी बाँध कर
दिया करतीं थीं

और याद है
एक बार
ज़िद्द कर में
उसके पीछली
सीट पर
बैठ गई थी
और पहिये में आकर
मेरा दुप्ट्टा फट गया था
बहुत डाँटा था
पपा ने उस दिन


अध्याय - ०३
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और वो अंगीठी
जिस पर रखे
कोयलों को
फूँकते - फूँकते
तुम्हारी आँखें
आँसूओं से भरकर
लाल हो जाया करती थीं

तुम
हर शाम
घर के बाहार बने
आँगन में उसे
जलाती
और वही
समय होता जब
हम सब बच्चे
मिलकर
ऊँच-नीच का पपङा
खेलते
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अनकही यादें...

2:37 PM Posted by संगीता मनराल


अनकही यादें - ०१
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मुझे आज भी
अपनी किताबों से भरी
अलमारी के सामने
तुम्हारा बिंम्ब
नजर
आने लगता है
जहाँ तुम अपने
पँजों के बल पर
उचककर
किताबों के ढेर में
अपनी पंसदीदा
किताब को तलाशते
घंटों बिता
देती थी
और मैं तुम्हारी
ऐङी पर पङी
गहरी, फटी
दरारों को देखता रहता


अनकही यादें - ०२
****************
गये पतझङ में
मैं तुम्हारे
आँगन मे खङे
पीपल के
पीले गिरे पत्तों से
चुनकर
एक सूखा पत्ता
उठा लाया था

वो
आज भी
मेरे पास
मेरी पसंदीदा
किताब के
पेज नम्बर २६
के बीच पङा
मुझे
परदेस में
तुम्हारा
प्यार देने को
सुरक्षित है


दायरे.....

11:17 AM Posted by संगीता मनराल


वो दायरे
तुम्हीं ने तो बनाये थे


हमारे रिश्ते के बीच
और आज


तुम ही पूछते हो

क्यों तुम
इतनी पराई लगती हो...??

कल रात का सपना

10:31 AM Posted by संगीता मनराल

मेरे सर पर लाल सुनहरे गोटे वाली चुनरी और माथे पर बङी गोल सिंदूर की लाल बिंदिया थी. उस दिन मैं खुद को एक महारानी सा महसूस कर रही थी.

सभी अपने अनुभवों कि लम्बी चादर फैलाकर शायद मुझे भी अहसास कराना चाह रहे थे कि मैं भी उन लोगो मे से एक उस पर बैठी हुई हूँ.


माँ ने नज़र का काला टीका लगाया था मेरे दाँये कान के पीछे, ठीक निचले हिस्से पर, लेकिन फिर भी हर दो मिनट बाद आकर मेरे चहरे को अपने दोनों हाथों से प्यार से सहलाती और फिर हाथों को अंगुलियों से चूम लेती तो कभी मेरे सर पर अपने दोनों हाथ घुमाकर अपने माथे के दोनों ओर अंगुलियों से कङक की अवाज़ करती जैसे आज शायद सारे ज़माने की बलायें मुझपर आ गिरेगीं.

आज का दिन जिन्दगी मे एक ऐसी खुशी सा लग रहा था जो मेरे अलावा वहाँ मौजूद सभी के चेहरे पर अपने आप झलक पङता. माँ बनने का गौरव और खुशी आज दुगनी हो गई.

सभी औरतों ने बारी बारी से मेरी गोद में अपने उपहार रखतीं और पास आकर कान मे अच्छी बातें कहती और मैं सब सुनकर खिलखिलाकर हँस पङती.

इसी क्रम मे सारी रात कब बीती और कब सुबह हो गई पता भी नहीं चला माँ सिरहाने बैठी उठा रहीं थीं, और मेरी आँखे खोलते ही पूछने लगीं क्या हुआ सोते हुये मुस्कुरा क्यों रही थी.. कोई अच्छा सपना देखा क्या? और मैं उन्हें देखकर फिर से मुस्कुरा दी और मन ही मन सोचने लगी सच सपना तो वकई बहुत अच्छा था..