जीवन एक रेखागणित

10:30 AM Posted by संगीता मनराल

दो जीवन समान्तर
चलकर भी कभी
बिछुङ जाते हैं

एक नारियल बेचने वाला
अपनी वृत की गोल
परिधी में घूमकर भी कभी
खो जाता है

और वो प्रेमी अपनी
पत्नी और प्रेमिका के
प्रेम मे पङकर
एक त्रिभुज के तीन कोनों में
असंतोष और भय से
बचता हुआ
भटक - भटक कर
थक जाता है

रिश्ते
बदल जाते है कभी
जैसे किन्ही दो
रेखाओं का कोण
किसी आकृति की
रुपरेखा बदलकर उसे
वर्ग से आयताकार बनाकर
उन रेखाओं के बीच की
दूरी बढा देता है

(विजेन्द्र एस. विज़ की पेन्टिंग)

"तुम यहीं तो हो"

8:19 AM Posted by संगीता मनराल

शाम के धुंधलके में
ओस की कुछ बूदें
पत्तों पर मोती सी चहक कर कह रही हैं
तुम यहीं तो हो
यहीं कहीं शायद मेरे आसपास
नहीं शायद मेरे करीब
ओह$ नहीं सिर्फ यादों में
दूर कहीं किसी कोने में छुपे जुगनू से
जल बुझ, जल बुझ
भटका देते हो मेरे ख्यालों को
और भवरें सा मन
जा बैठता है कभी किसी तो
कभी किसी पल के अहसास में
और तब तुम
दिल में उठती एक टीस की तरह
घर कर जाते हो दिलों दिमाग में......
(पेबलो पिकासों की पेंटिंग)

एकतारे का सुर

12:55 PM Posted by संगीता मनराल


हम चले जा रहे थे, आगे घाट की ओर तभी ध्यान गया अपनी दाईं तरफ एकतारे का सुर, पहले भी सुना तो था लेकिन इतना मधुर नहीं, कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या शब्द हैं, क्या गीत के बोल हैं क्या गा रहा है? लेकिन एकतारे का सुर और बोल के साथ ताल बहुत मोहक थी राक सुनती हूँ, गज़ल, फ्यूज़न और शास्त्रीय भी लेकिन ये जो भी था मन को तर करने वाला था सो रिकार्ड कर लिया पहले लगा १ मिनट बहुत है, लेकिन जब डाउनलोड करके सुना तो लगा कि और क्यों नहीं रिकार्ड कर लिया

वो रोज़ सुबह यहाँ आता है, एकतारा और साथ में एक थाली लिये, पहले जब आँखों की रोशनी थी तब महाजन के खेतों में काम करता था, एकतारे को अपने मन बहलाने या शौक के लिये बजाया करता था लेकिन अब वो उसकी अजीविका का साधन बन गया है उसने ये एकतारा खुद बनाया, आश्चार्य हुआ खुद कैसे, कद्दू को सुखा कर और उस पर एक डंडी को तार से बांध कर वो दुनिया से बेखबर बस बजाता रहता है और भगवान को याद करता है, शायद मन ही मन कोसता भी हो भगवान आप कितने कठोर हैं अब आगे के दिन ऐसे ही गुज़रेगें जिन्दगी पहले बहता पानी लगती थी लेकिन अब बहुत विशाल पहाङ

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