कुछ हायकू

9:43 AM Posted by संगीता मनराल

धर्म धर्म है
बनाता इंसा इसे
अधर्म क्यों
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जिहाद क्या
खुदा की इबादद
आंतकवाद
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रमज़ान के
रोज़े की सहरी से
जागी सुबह
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कूङा बीनता
गरीब बचपन
सङकों पर
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महानगर
दौङ रहा आदमी
पैसों खातिर
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बच्चे रोते
चिङिया लाती दाना
कहीं दूर से
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काले बादल
घनघोर घटायें
बरखा लायें
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नहीं भूलते
बचपन के दिन
सच है ना
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रुनझुन से
रीनी के घर तक
फूल क्यों खिले
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चांदनी रात
हमसफर साथ
वाह क्या बात
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तितली उङी
बनकर वो पंछी
डालियों पर
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सर्द सवेरा
ओढकर आई है
शीत की ऋतु
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धूप सुहानी
सुनहरी हलकी
मनवा भावे
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डाके तन को
स्वेटर पहनकर
निकले हम
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देर से आते
जल्दी क्यों छिपते
सूरज तुम
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रेवङी – गुङ
मुंगफली गज्ज्क
खायेगें हम
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