तुम्हारा प्यार

11:46 AM Posted by संगीता मनराल

कितनी मुरादों से तुम्हें पाया है
शायद तुम्हें यकीन ना हो


पर फिर भी


मैं अपनी पलक से गिरने वाले
उस छोटे बाल के टुकडे को
हथेली पर सजाकर
आंख मूंदकर तुम्हें मांगती
और फिर उसे तेज़ फूंक से उड़ा देती



कई टूटते सितारों को मैंने
तुम्हारा प्यार पाने के लिए
ज़मीन पर गिरने दिया


और वो संतरी, छोटा
पंख वाला कीड़ा
जिसे हाथ पर रखकर
पास-फेल पास-फेल


किया करती थी
आज तक मुझे
मेरे श्रम की
याद दिलाता है

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माँ

10:51 AM Posted by संगीता मनराल

माँ जोडती है घर को
जैसे नन्ही गोरैया
लाती है एक एक तिनका
अपने घरोंदे में लगाने को

सर्द रातों में
फुटपाथ पर पड़ी देह ठिठुरती है
एक टुकड़ा कम्बल के लिए
माँ पसीजती है
ले आती है अपना
सबसे कीमती
पुराना हो चुका शाल

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मारीचिका

12:56 PM Posted by संगीता मनराल

वो दिन मुझे हमेशा याद रहेंगे, शायद जिंदगी के सबसे बेहतरीन दिनों में से कुछ या बहुत कुछ बेहतर, मुझे पता था की मैं तुम्हें धोखा दे रही हूँ, और ये सब ठीक नहीं है.. लेकिन फिर भी मन वो सब करने से डर नहीं रहा था.. डर के साथ साथ एक ख़ुशी समायी हुई थी, ये सब भ्रमित करने वाला था, हमेशा के लिए.... ये जानते हुए की इन सब बातों का कोई भविष्य नहीं फिर भी में उन बातों में उलझना चाहती थी, बिना किसी परवाह के... कई बार दिल में ख्याल आता की तुम मुझे कभी माफ़ नहीं करोगे, ऐसा लगता था की दिल के दो टुकडे हो गये हैं.. एक दायाँ और एक बायाँ, दायाँ हिस्सा यथार्थ दिखाता और बायाँ कल्पनाशील दुनिया... वैसे भी दायाँ तो हमेशा सीधा ही हुआ है ना, तो वो गलत कैसे हो सकता था... लेकिन मेरा मन बाएं के साथ ही रहना चाहता था... वो, वो सब कुछ करना चाहता था जो दिल के बाएं हिस्से ने सोच रखा था....

स्टोव के ऊपर चढ़े चाय के बर्तन, जिसके बाहर इतनी कालिख जम चुकी थी की वो झड- झड कर नीचे गिरने लगी थी... और बर्तन अलुमिनियम का होने की वजह से अन्दर से काफी कड़ा हो चुका था, चारो तरफ चाय की मलाई भूरे से कुछ हलके रंग की और उसमें डला अदरक हवा में एक अलग सी गंध पैदा कर रहा था.... कांच के तिकोन ग्लास में रखी चाय बहुत कम लग रही थी... शायद वो इसलिए भी की इतनी स्वाद होने की वजह से और पीने का मन था... कुछ एक लोग चाय की एक चुस्की के साथ सिगरेट के कश लगते धुएं के बादल उड़ाते हवा में चाय की गंध को बदल रहे थे... मन हुआ चाय के कसैले स्वाद के साथ सिगरेट का कसैला स्वाद कैसा लगता होगा... खैर मन पर अब भी बाएं हिस्से के दिल का वर्चस्व कायम था...

मुझे महसूस होता मुझ में नयी शक्ति का संचार हो रहा है... मन लम्बी - लम्बी पींगे मारने लगता, मैं सोचती काश ये वक्त ठहर जाए... वक्त कैसे किसी के लिए ठहर सकता है... तो लगता ठहर नहीं सकता तो पीछे ही चला जाए... ये सब ख्याल बाएं हिस्से के साथ रहने से और प्रबल हो जाते.... मन नई - नई धुनें गुनगुनाने लगता, लगता की क्या - क्या नया ना पहन लूँ... सुन्दर लगने को आतुर रहता... रिमझिम बारिश में टहलते हुए गाने सुनने को चाहता.... दिल के दो टुकड़ों को एक कर उसमें इतनी ख़ुशी भर देता की वो ख़ुशी उम्र भर के लिए काफी थी... ये सब बाएं हिस्से की करामात थी.... फिर बायाँ उल्टा कैसे हो सकता है, ये मेरे मन को भ्रमित करने के लिए काफी था..... मैं उड़ रही थी... बिना रुके बिना थके मारीचिका की ओर.....

उमस भरा एक दिन

3:22 PM Posted by संगीता मनराल

दिन का १ बजा है, मेरा स्कूटर रेड लाइट पर रुका, पास ही एक ऑटो भी रुका इतनी गर्मी, वैसे गर्मी कहना गलत होगा इतनी उमस... हाँ अक्सर कहते सुना है जुलाई - अगस्त के महीने ऐसे ही होते हैं. सूरज बादलों के पीछे है.. लग रहा है बादलों को किसी का इंतज़ार है.. हाँ शायद हो भी सकता है... पड़ोस का रिंकू, मोनू, मिंकू और अरुण की मम्मी स्कूल से घर पहुच जाए... तब बरसेंगे... नहीं तो न जाने कितने ही ताने न दे डालें...

आज लगता है रेड लाइट कुछ ज्यादा लम्बी हो गयी है... अरे हाँ यहाँ की रेड लाइट तो अक्सर ख़राब ही रहती है. बेचारा ट्राफिक इंस्पेक्टर रोज इतनी चक्कलस करता है.... बावजूद इसके लोग जहाँ मन हुआ वहां निकाल ले जाते हैं और देखते ही देखते कितनी ही गाड़ियाँ आ गयी..

हम शांत भाव से जेब्रा क्रोस्सिंग के पीछे ही खड़े हैं, मै, ऑटो वाला और इतनी उमस... ऑटो के अन्दर मुस्लिम परिवार है... मैं इतनी आश्वस्त इसलिए थी की अन्दर बैठी महिला ने बुरका पहना हुआ है,सोचा क्या उसे गर्मी नहीं लग रही होगी.. खैर शायद धर्म इतनी रियायत ना देता हो. महिला की गोद में करीब ५-६ वर्ष का बच्चा है जो गोल सफ़ेद, जालीदार (क्रोशिये से बुनी) टोपी लगाये बार बार अपने चहरे से पसीना पोछ रहा है... उसके माथे और गर्दन के आसपास घमौरियां हैं.. कुछ लाल हैं और कुछ पानी निकल जाने से पिचक कर उसके शरीर पर सफ़ेद छिलकेदार पाउडर सी लग रही हैं...

हम अब भी रेड लाइट पर ही हैं... पता नहीं अभी कितनी देर और लगे... और ये बारिश अब भी अड़ियल बच्चो की तरह टस से मस नहीं हो रही... मैं बोलती हूँ अब तो रिंकू, मोनू, मिंकू और अरुण की मम्मी भी घर पहुँच गये होंगे कोई कुछ नहीं कहेगा.. अब तो बरसो.. ये उमस शायद कुछ कम हो जाए...

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12:27 PM Posted by संगीता मनराल

तारीख २२ अगस्त, दिन सोमवार, शाम के ०४:३० का समय में भी अन्ना के आन्दोलन की भागीदार बनना चाहती थी, सो इस आन्दोलन को प्रत्यक्ष रूप से महसूस करने पहुँच गयी रामलीला मैदान लोगो से खचा-खच भरा मैदान देख कर मन गदगद हो गया... लगभग सारे भारतवर्ष के लोग इस आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहते थे दिल में जोश लिए और आँखों में तमन्ना की जनलोकपाल बिल आ गया तो वाकई भारत की कुछ और तस्वीर होगी... घर से सोचकर आई थी की शायद १ घंटा ही रुक पाऊँगी लेकिन मन ही नहीं हुआ की वहां से निकला भी जाए

कुछ लोगो से बात हुई तो मालूम हुआ की लोग जाने कहाँ कहाँ से आये हैं. अपना घर, बच्चे और नौकरी (छुटी नहीं मिली) छोड़कर उन्ही लोगो में से एक महेश पाल भी थे, अहमदाबाद से आये हैं... जब रामदेव बाबा का अनशन था तब भी आये थे... बताते हैं की वो प्रत्यक्ष साक्षी हैं पुलिस के डंडो के... उनका मानना भी यही है की जो उस रात हुआ वो गलत था. महेश उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं लेकिन रहते अहमदाबाद में हैं. जींस की पैंट सिलने की दुकान चलाते है शादी नहीं की है और आगे करने का भी इरादा नहीं है, वैसे परिवार है, माँ पापा बड़े भाई भाभी और उनके बच्चे.

मैंने पूछा आप यहाँ क्यों आये हैं, तो बोले पिछले कई दिनों से टीवी पर देख रहा था... लेकिन वहां रुका ना गया तो चला आया. महेश बताते हैं की वे रोज पूजा करते समय भगवान से यही दुआ करते थे की कुछ तो करो इस भ्रष्टाचार का... और आज उनकी दुआ कबूल हुई मालूम पड़ती है... अब जब तक जनलोकपाल नहीं आ जाता और अन्ना जी अनशन नहीं छोड़ते वो यहाँ से कहीं नहीं जाने वाले...

सच रामलीला मैदान में जो देखने को मिला वो सब, उम्मीदों से कहीं ऊपर था सभी उम्र, प्रान्त, जात, धर्म के लोग मौजूद थे वहां. अन्ना जी बार बार यही दोहराते हैं की उनको इन लोगो को देखकर ऊर्जा मिलती है... ये सच है... वही ऊर्जा का प्रवेश मैंने अपने भीतर भी महसूस किया..

यहाँ ब्लॉग में ये सब लिखना इसलिए जरुरी हो जाता है की में इस आन्दोलन को हमेशा अपनी यादों में संजोकर रखना चाहती हूँ. बताना चाहती हूँ की में भी इसका हिस्सा रही हूँ... क्या आप थे वहां??

सुख

10:35 AM Posted by संगीता मनराल

तुम समझती नहीं हो तुम्हारे मम्मी - पापा नहीं मानेगे, चलो हम घर से भाग कर शादी कर लेते हैं. लड़का जिद्दी बच्चों की तरह उसका दिमाग खाए जा रहा है. क्यों नहीं मानेंगे उन्हें मानना होगा ये मेरी जिंदगी है. में कुछ भी करूँ, लड़की आत्मविश्वास से भरी, पूरी दुनिया से लड़ने को तैयार खड़ी है. चलो रिक्सा कर लेते हैं धूप बहुत है. तुम पहले ठीक से बोलना सीखो सा नहीं शा, लड़की झुंझला कर बोलती है. उसकी झुंझलाहट शा को सा बोलने पर थी या मम्मी - पापा ने ना मानाने पर ये कहना थोडा मुश्किल है....

लड़का झेंप जाता है, ठीक है तुम इतना क्यों चिढ रही हो. लड़की के मुख के भाव अब भी जस के तस बने हुए हैं. जब देखो फटीचर बने रहते हो, कम से कम मुझ से मिलने आते हो तो ढंग के तो बनकर आया करो. क्या सिर्फ यही काला कुर्ता है तुम्हारे पास एक तो रंग काला और रही सही कसर ये काला कुर्ता निकाल देता है. Fair and Handsome लगाना शुरू किया.. की नहीं. लड़की बिना रुके हिदायतें दिए जा रही है. शायद वो कोई भी ऐसा point नहीं छोड़ना चाहती थी जिससे की उसके घर वाले ना माने.

उन्होंने रिक्शा कर लिया है, और थोड़ी ही देर में वे धीरे धीरे आँखों से ओझल हो गये.

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प्यार

12:50 PM Posted by संगीता मनराल

प्यार लौट आया है जिंदगी में
पूछा था तूमने ...
या कहा था
याद नही,
लेकिन सच , लौट तो आया है
सिरहाने रखी तस्वीर तुम्हारी
रातों को अक्सर जगाने लगी है...

आँख खुली तो देखा
लालटेन का कांच टूटा था
किनारे से,
तुमने समझाया था मुझे
कांच को हाथ से न उठाना
लग सकता है हाथों में
मैं मुस्कुराई थी
और तुम,
झांक रहे थे मेरी आँखों में...

हाँ तभी लगा
प्यार शायद लौट आया है...
....