आज़ादी को सलाम

4:08 PM Posted by संगीता मनराल

आजकल सभी जगह आज़ादी को लेकर सरगर्मी है, रेडियो से लेकर, समाचार चैनल और अखबारों तक हो भी क्यों नहीं हमारी आज़ादी को ६० वर्ष जो पूरे हो गये है कभी कभी लगता है, क्या वाकाई हम आज़ाद हुये हैं देखा जाये तो अभी भी कई सारे मसले हैं जिनकी तरफ देखकर यही अहसास होता है कि हम अब भी आज़ाद नहीं है फर्क बस इतना है कि पहले देश पर अंग्रेजों का शासन था और आज सरकार, सरकार के बाशिदों और पैसे वाला का शासन है

बङी गाङी चलाने वाला, छोटी गाङी चालक पर हावी दिखता है हद तो तब हो जाती है जब, २६ साल का नौजवान अपने पिता समान आदमी को एक तमाचा जङ देता है क्योकि उसकी गलती सिर्फ इतनी होती है कि वो रिक्शा चालक है और गलती से उसका रिक्शा नौजवान कि गाङी से टकरा गया

देश के निचले तबके के लोग (निचले तबके का इशारा उन गरीब लोगों कि ओर है जिनको दो वक्त कि रोटी जुटाना बहुत मुश्किल पङता है) अब भी गुलामों जैसी जिन्दगी बसर कर रहे हैं उनकी कहीं कोई पहचान नहीं, उनको और उनकी किल्लतों को सुनने वाला कोई नहीं

देश आज़ाद है, देश ने तरक्की भी की है, देश विदेशों मे अपनी अहम पहचान बना चुका है लेकिन इन सब के बावजूद इसी देश के निवासी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिये गुलामों जैसा व्यवहार भी सहन कर लेते है

देश क्या वाकई आज़ाद है???

सुख

6:01 PM Posted by संगीता मनराल

भाग (१)

आज फिर लेट हो जायेगा, तेज गाङी चलाती हूँ पिछले तीन दिन से रेड मार्क लगवा रही हूँ बस आज और लेट हुई तो बास से झाङ पक्का इला झुनझलाहट में अपने आप से बात किये जा रही थी ये मोटर बाईक वाले भी ना जहाँ से मन किया वहाँ से निकाल लेते है जरा भी नहीं सोचते अब देखों फुटपाथ को भी नहीं छोङा, खैर क्या करें ट्रैफिक ही इतना हो गया है जहाँ देखों वहीं कुछ ना कुछ काम चल रहा है, अब सरकार का क्या है, उनकों तो कभी ट्रैफिक जाम से वासता नहीं हो भी कैसे दौरे से पहले सारा ट्रैफिक, रोक जो लिया जाता है जहाँ देखो वहाँ भाग-दौङ हर कोई रेस मे भागने वाले घोङों कि तरह भागता ही जा रहा है कितना कुछ बदल गया है लोगो और उनके विचारों मे ग्लोबल वोर्मिग ने लोगों के अन्दर भी इतनी वार्मथ भर दी है कि कहीं भी लोग उबल पङते है, चाहे गलती हो या ना हो ओफ ओ आज फिर से इतना ट्रैफिक देखो तो क्या हुआ है आगे, अच्छा ट्रक खराब है अब तो घन्टा कहीं नहीं गया

अम्मा के पास जमीन पर आलथी पालथी लगाये, उनके हाथों से बना चने का साग और हथेलियों से थपका-थपकाकर चूल्हें पर बनी रोटी खायें ज़माना बीत चला है कितनी बार तो फोन पर कहा अम्मा ने घूम जाओ तो मेरा भी दिल बहल जाये

टें-टें, टें$$$$$$$$$$$$$$ ओफ-ओ जरा भी सब्र नहीं अरे भाई आगे का तो ट्रैफिक बढने दो वैसे भी १० कदम चलकर तो गाङी ने २० मिनट के लिये रुकना ही है इला कि झुनझलाहट अब भी बरकरार थी

यहाँ पिछले ५ सालों से अकेले रहते, वो सब से दूर सी हो गई है ठीक वैसे ही जैसे अपना घर छोङकर लोग विदेश में आकर परदेसी हो जाते हैं उसे टाईम भी तो कहाँ है, इतनी दिक्कत है कि कभी कभी तो हफ्ता गुजर जाता है अम्मा से बात किये