
स्टोव के ऊपर चढ़े चाय के बर्तन, जिसके बाहर इतनी कालिख जम चुकी थी की वो झड- झड कर नीचे गिरने लगी थी... और बर्तन अलुमिनियम का होने की वजह से अन्दर से काफी कड़ा हो चुका था, चारो तरफ चाय की मलाई भूरे से कुछ हलके रंग की और उसमें डला अदरक हवा में एक अलग सी गंध पैदा कर रहा था.... कांच के तिकोन ग्लास में रखी चाय बहुत कम लग रही थी... शायद वो इसलिए भी की इतनी स्वाद होने की वजह से और पीने का मन था... कुछ एक लोग चाय की एक चुस्की के साथ सिगरेट के कश लगते धुएं के बादल उड़ाते हवा में चाय की गंध को बदल रहे थे... मन हुआ चाय के कसैले स्वाद के साथ सिगरेट का कसैला स्वाद कैसा लगता होगा... खैर मन पर अब भी बाएं हिस्से के दिल का वर्चस्व कायम था...
मुझे महसूस होता मुझ में नयी शक्ति का संचार हो रहा है... मन लम्बी - लम्बी पींगे मारने लगता, मैं सोचती काश ये वक्त ठहर जाए... वक्त कैसे किसी के लिए ठहर सकता है... तो लगता ठहर नहीं सकता तो पीछे ही चला जाए... ये सब ख्याल बाएं हिस्से के साथ रहने से और प्रबल हो जाते.... मन नई - नई धुनें गुनगुनाने लगता, लगता की क्या - क्या नया ना पहन लूँ... सुन्दर लगने को आतुर रहता... रिमझिम बारिश में टहलते हुए गाने सुनने को चाहता.... दिल के दो टुकड़ों को एक कर उसमें इतनी ख़ुशी भर देता की वो ख़ुशी उम्र भर के लिए काफी थी... ये सब बाएं हिस्से की करामात थी.... फिर बायाँ उल्टा कैसे हो सकता है, ये मेरे मन को भ्रमित करने के लिए काफी था..... मैं उड़ रही थी... बिना रुके बिना थके मारीचिका की ओर.....