Thursday, October 16, 2008

"तुम यहीं तो हो"

शाम के धुंधलके में
ओस की कुछ बूदें
पत्तों पर मोती सी चहक कर कह रही हैं
तुम यहीं तो हो
यहीं कहीं शायद मेरे आसपास
नहीं शायद मेरे करीब
ओह$ नहीं सिर्फ यादों में
दूर कहीं किसी कोने में छुपे जुगनू से
जल बुझ, जल बुझ
भटका देते हो मेरे ख्यालों को
और भवरें सा मन
जा बैठता है कभी किसी तो
कभी किसी पल के अहसास में
और तब तुम
दिल में उठती एक टीस की तरह
घर कर जाते हो दिलों दिमाग में......
(पेबलो पिकासों की पेंटिंग)

11 comments:

Unknown said...

संगीता जी आपको बधाई । सुन्दर रचना के लिए । आपने बहुत अच्छे भाव का शब्दों के भाध्यम से साकार रूप दिया है । पहली बार ही आपका काव्य पढ़ा अच्छा लगा । शुभ वर्तमान

योगेन्द्र मौदगिल said...

WAH
भावात्मक कविता
आपको बधाई एवं शुभकामनाएं

ताऊ रामपुरिया said...

और भवरें सा मन
जा बैठता है कभी किसी तो
कभी किसी पल के अहसास में
और तब तुम
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ! शुभकामनाएं !

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

birah ka geet lagta hai .sunder

admin said...

तुम यहीं तो हो
यहीं कहीं शायद मेरे आसपास
नहीं शायद मेरे करीब
ओह$ नहीं सिर्फ यादों में
दूर कहीं किसी कोने में छुपे जुगनू से।

बहुत खूबसूरत से भाव हैं, पढ कर अच्छा लगा। बधाई।

makrand said...

wah kya sunder kaha aap ne
tum ho yehi sabse kubsorat ahasas
he
regards

राज भाटिय़ा said...

दिल में उठती एक टीस की तरह
घर कर जाते दिलों दिमाग में......
बहुत ही सुन्दर है यह आप की कविता
धन्यवाद

डॉ .अनुराग said...

ऐसा लगा जैसे दिल से निकली आवाज है.....ओर पेन्टिंग भी खूब है......

Dr. Ashok Kumar Mishra said...

संगीता जी,
आपकी किवता बहुत अच्छी है । भावों की प्रखर अिभव्यिक्त है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख- सुरक्षा ही नहीं होगी तो कैसे नौकरी करेंगी मिहलाएं-लेख िलखा है । इस पर अपने िवचार व्यक्त कर आप बहस को आगे बढा सकती हैं ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

betuki@bloger.com said...

बेहतरीन रचना। बधाई।

Naren said...

very good....chha gaye...