माँ

10:51 AM Posted by संगीता मनराल

माँ जोडती है घर को
जैसे नन्ही गोरैया
लाती है एक एक तिनका
अपने घरोंदे में लगाने को

सर्द रातों में
फुटपाथ पर पड़ी देह ठिठुरती है
एक टुकड़ा कम्बल के लिए
माँ पसीजती है
ले आती है अपना
सबसे कीमती
पुराना हो चुका शाल

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1 comments:

  1. Anonymous said...

    :)