दिल्ली हिन्दी ब्लागर मीट - १४.०७.२००७
हिन्दी ब्लागर मीट, करीब ११ बजे से शुरु होकर सांय ७:३० पर समाप्त हुई कई नामी गिरामी ब्लागरस ने भाग लिया मीट कनाट प्लेस के कैफे काँफी डे शुरू होकर गङी तक चली सुबह सभी कनाट प्लेस के कैफे काँफी डे में इकट्ठे हुये थे लेकिन ज्यादा जगह ना होने और ज्यादा ना बैठने (कैफे काँफी डे) देने कि वजह को मद्देनजर रखते हुये वेन्यू बदलकर गढी कर दिया गया हम सुबह समय से वहाँ नहीं पहुँच सके इसका खामियाजा हमें भुगतना पङा
हम १२:०० बजे के निकले आखिरकार ४:३० बजे गढी, मीट मे शिरकत करने पँहुच ही गये अन्दर घुसे तो कई लोग भोजन कर चुके थे और कई भोजन कर रहे थे मैं सिर्फ एक ही ब्लागर महानुभव (आलोक पुराणिक जी) को पहचान सकी, बाकी सब के चहरे पहचानने कि कोशिश करते हुये पास ही रखी कुर्सी पर बैठ गई, पास ही सोफे पर सुजाता जी और निलिमा जी भोजन कर रही थीं सो सबसे पहला परिचय उन दोनों से ही हुआ (कुछ परिचय हमनें उन से लिये और कुछ एक का परिचय हमने ही ले डाला जो ब्लागर बचे थे वे शाम बीतते पहचान मे तबदील हो गये)
फिर हम धीरे-धीरे सरकते हुये घूघूती-बासूती जी के पास ही हो लिये बहुत से मुद्दे उठे, बहुत सी सार्थकतायें सामने आई, कई भविष्य कि योजनाओं पर बातें हुई कई टैक्नालोजी मे महारत ब्लागरस ने अपनी दक्षता का परचम फहराते हुये अपने विचार रखे, लेकिन "काला अक्षर भैंस बराबर" वाली कहावत को सिद्ध करते हुये वो विचार हमारे सर के ऊपर से निकल गये
मुद्दा ये था कि कैसे नये ब्लागर बनाये जायें , क्यों की हिन्दी बोलने , पढने और लिखने वाले बहुत से लोग है , लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि हिन्दी जो कहीं खोती जा रही है उसे आम आदमी के बीच कैसे लाया जाये और कैसे उसे इतना आर्कषक बनाया जाये कि लोग पढने को आतुर हो सकें
मुद्दा ये था कि कई नये एग्रीगेटर आ गये है , तो यह् एक भेडचाल सी है (जो एक टफ कम्पिटिशन भी देगा -ये मेरा मत है) तो क्यों ना कुछ नया किया जाये , लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि ऐसा क्या नया किया जाये जो हिन्दी कि बेहतरी के लिये कारगर साबित हो
मुद्दा ये था की कान्टेन्टॅ में रिचनेस और डाइवर्सिटी कैसे लाई जाये, लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि लेख सिर्फ व्यक्तिगत सम्बन्धो और व्यक्ति विशेष तक ना सीमित रहकर आम लोगों कि जिन्दगी को भी छूता हुआ हो (जो शायद नये पाठकों को भी समझ आये)
मेरा ये लेख लिखने का मकसद किसी भी व्यक्ति विशेष को आहत करना या फिर उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना बिलकुल भी नहीं है ये कुछ विचार मात्र हैं जो शायद समयाभव के कारण (या अपरिचित ब्लागर) मीट के दौरान व्यक्त नहीं कर पाई
हम १२:०० बजे के निकले आखिरकार ४:३० बजे गढी, मीट मे शिरकत करने पँहुच ही गये अन्दर घुसे तो कई लोग भोजन कर चुके थे और कई भोजन कर रहे थे मैं सिर्फ एक ही ब्लागर महानुभव (आलोक पुराणिक जी) को पहचान सकी, बाकी सब के चहरे पहचानने कि कोशिश करते हुये पास ही रखी कुर्सी पर बैठ गई, पास ही सोफे पर सुजाता जी और निलिमा जी भोजन कर रही थीं सो सबसे पहला परिचय उन दोनों से ही हुआ (कुछ परिचय हमनें उन से लिये और कुछ एक का परिचय हमने ही ले डाला जो ब्लागर बचे थे वे शाम बीतते पहचान मे तबदील हो गये)
फिर हम धीरे-धीरे सरकते हुये घूघूती-बासूती जी के पास ही हो लिये बहुत से मुद्दे उठे, बहुत सी सार्थकतायें सामने आई, कई भविष्य कि योजनाओं पर बातें हुई कई टैक्नालोजी मे महारत ब्लागरस ने अपनी दक्षता का परचम फहराते हुये अपने विचार रखे, लेकिन "काला अक्षर भैंस बराबर" वाली कहावत को सिद्ध करते हुये वो विचार हमारे सर के ऊपर से निकल गये
मुद्दा ये था कि कैसे नये ब्लागर बनाये जायें , क्यों की हिन्दी बोलने , पढने और लिखने वाले बहुत से लोग है , लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि हिन्दी जो कहीं खोती जा रही है उसे आम आदमी के बीच कैसे लाया जाये और कैसे उसे इतना आर्कषक बनाया जाये कि लोग पढने को आतुर हो सकें
मुद्दा ये था कि कई नये एग्रीगेटर आ गये है , तो यह् एक भेडचाल सी है (जो एक टफ कम्पिटिशन भी देगा -ये मेरा मत है) तो क्यों ना कुछ नया किया जाये , लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि ऐसा क्या नया किया जाये जो हिन्दी कि बेहतरी के लिये कारगर साबित हो
मुद्दा ये था की कान्टेन्टॅ में रिचनेस और डाइवर्सिटी कैसे लाई जाये, लेकिन मुद्दा ये नहीं था कि लेख सिर्फ व्यक्तिगत सम्बन्धो और व्यक्ति विशेष तक ना सीमित रहकर आम लोगों कि जिन्दगी को भी छूता हुआ हो (जो शायद नये पाठकों को भी समझ आये)
मेरा ये लेख लिखने का मकसद किसी भी व्यक्ति विशेष को आहत करना या फिर उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाना बिलकुल भी नहीं है ये कुछ विचार मात्र हैं जो शायद समयाभव के कारण (या अपरिचित ब्लागर) मीट के दौरान व्यक्त नहीं कर पाई



17 Comments:
At 8:05 PM ,
अरुण said...
आपकी प्रस्तुती बहुत अच्छी रही,वहा भी आप कह सकती थी.लेकिन यहा भी बहुत बढिया रही
At 9:14 PM ,
काकेश said...
चलिये आपने वहाँ नहीं कहा यहां कह दिया.अगली बार आयेंगी तो हम भी मिल लेंगे आपसे...और आपको को जबरदस्ती बोलने को कहेंगे :-)
At 9:15 PM ,
मोहिन्दर कुमार said...
Pehli baar mile thae is liye hum bhi aap ko pehchaan nahi paaye... agli baar aisa nahi hoga..
At 9:47 PM ,
Udan Tashtari said...
हम तो खैर मिले ही नहीं मगर पहचान जरुर जायेंगे-आपको भी और विज को भी. :)
अच्छे विचार रखे हैं. इन पर विमर्श होना चाहिये.
At 10:11 PM ,
Sanjeet Tripathi said...
बढ़िया लगे आपके विचार!!
At 10:20 PM ,
शैलेश भारतवासी said...
आपसे बहुत कम बात हुई , लेकिन आपसे थोड़ा सा ही मिलना अच्छा रहा। आपकी चिंता लाज़िमी है, लेकिन प्रयोग ही बेहतरी की तरफ़ धकेलते हैं। यहाँ बड़ी बात यह है कि कैसे हिन्दी प्रयोक्ताओं को बढ़ाया जाये।
At 10:27 PM ,
उन्मुक्त said...
किस बारे में सोचना चाहिये पढ़ कर अच्छा लगा। लगता है कि आपकी बेचैनी दूर हो गयी है। अब आप विचारों को 'सिगरेट के धूयें' की तरह 'अपनी गन्ध छोङ जाते' को छोड़ कर, गुलाब की महक बिखेरने की तरह सोचने लगी हैं।
At 10:59 PM ,
sunita (shanoo) said...
संगीता जी बहुत अच्छा लिखती है आप,मन के भाव गहरे है पढ़कर अच्छा लगा,और लिखा भी बिल्कुल सटीक है...इस तरह की ब्लागर मीट का कोई औचित्य नही समय की बर्बादी है और परेशानियों को आमन्त्रण है अगर इस प्रपंच में हम पड़ जायें,क्या लिखे कितना लिखे यह भी समझ नही पाते है,झूठ लिखना बस में नही और सच सुनना कोई पसंद नही करता,... आपसे न मिल पाने का बेहद अफ़सोस है...आपका मेरे ब्लोग पर इन्तजार है...
http://shanoospoem.blogspot.com/
सुनीता(शानू)
At 11:01 PM ,
अफ़लातून said...
आपके विचार सही लगे।
At 1:21 AM ,
Divine India said...
पहली दफा आकर भी नहीं लग रहा है कि यह पहला है…बहुत सहजता से आपने अपने विचार भी रखें और ब्लागर मीट से भी परिचय करवाया… आप निश्चित ही बधाई की पात्र हैं…। धन्यवाद!!!
At 9:20 AM ,
संजय बेंगाणी said...
आपके विचार निसंदेह सही है, आप अपने ये विचार ब्लोगर मीट में रख सकती थी. पर अगली बार सही.
मुझे लगता है, विचारों को थोड़े विस्तार से लिखने की आवश्यकता है. तो हो जाये एक और पोस्ट इसी पर..
At 10:38 AM ,
Neelima said...
तो देर आऎ दुरुस्त आऎ !:) बहुत सही कहा आपने !
At 11:16 AM ,
Rajesh Roshan said...
वैसे हम लोग ऐसे संकोच करते रहते हैं । कम से कम हमे इनसे उबरना होगा । आपस में जानकारिया बांटनी होंगी । वैसे यहाँ जो लिख है अच्छा लिखा है ।
At 4:11 PM ,
mamta said...
संगीता जी आज पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ रहे है अच्छा लिखा है आपने और आपके विचार जानकार भी अच्छा लगा।ब्लॉगर मीट की बधाई।
At 3:34 PM ,
Sangeeta Manral said...
@ धन्यवाद! अरुण जी, दरअसल वहाँ बोलने वाले अधिक और सुनने वाले कम थे| तो सोचा क्यों ना सबको सुनकर ही अपने विचार लिखे जायें|
@ जरुर काकेश जी
@ धन्यवाद! मोहिन्दर जी, मेरी ओर से भी यही कोशिश रहेगी|
@ आपसे मिलने कि तो बरसों से तमन्ना है समीर जी, जल्दी ही कोई प्लान बनाये मिलने के लिये ना सही हिन्दी के लिये ही सही|
@ धन्यवाद! मोहिन्दर जी
@ आपसे भी मिलकर अच्छा लगा शैलेश, और आपके विचार बहुत प्रभावी थे, हमारी शुभकामानायें है| आपके सभी प्रयोग सफल रहें|
@ धन्यवाद! उन्मुक्त जी, लेकिन बेचैनी अभी भी बरकरार है, और कभी कभी हिन्दी के लिये नेतागिरी देखकर बहुत बङ भी जाती है|
@ बहुत बहुत धन्यवाद! सुनीता जी, मिलना तो हम भी आपसे चाहते थे| बदकिस्मती थी कि थोङा देरी से पँहुचे, आपसे जल्दी ही मुलाकात होगी|
@ धन्यवाद! अफ़लातून जी|
@ धन्यवाद! डिवाईन इन्डिया जी
@ धन्यवाद! संजय जी, मौका मिला तो जरूर अपने विचार व्यक्त कँरुगी| पोस्ट तो शायद ना लिख पाँऊ लेकिन बहेतरी के लिये प्रयास अग्रसर रहेंगे|
@ धन्यवाद! निलीमा जी
@ धन्यवाद! राजेश जी, संकोच शायद तब तक नहीं दूर होगा जब तक सभी को मौका ना मिले|
@धन्यवाद! ममता जी
At 5:26 AM ,
प्रवीण परिहार said...
संगीता जी काश मैं भी दिल्ली में होता तो सभी ब्लागर से विषेशकर आपसे मिलने का ये अवसर कभी हाथ से जाने न देता। आपके विचार पढकर अच्छा लगा। अगली बार ऐसी कोई ब्लागर मीट हो तो बस एक संदेश भेज देना यदि मैं दिल्ली में हुआ तो अवश्य ही भेट होगी।
At 10:42 AM ,
सुजाता said...
संगीता जी ,
बहुत स्वागत है ब्लॉग जगत में ।उस मुलाकात मे कहा था कि अपना भी ब्लॉग बनाइये आप और देखिये :-)
अब तो बदलाव बहुत आ गये हैं ।एक मंच बन गया है हम स्त्रियों का जहाँ पुरुष भी आकर अपनी बात कह सकते हैं ।
sandoftheeye.blogspot.com
आपका यहाँ इंतज़ार है , जॉइन करिये और यहाँ भी लिखिये ।
अपना ई मेल आई डी दीजिये गा ।
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